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 प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में भी पुख्ता नहीं हो पाई स्वास्थ्य सुविधाएं

भोपाल,

साल भर में भले ही हमारा राज्य 13 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का बजट जनता को स्वास्थ्य सुविधाओं देने के नाम पर खर्च होता है, लेकिन हकीकत यह है कि अब तक प्रदेश में चिकित्सकों की कमी दूर नहीं हो पाई। यह सििति न केवल हमारे स्वास्थ्य विभाग, बल्कि आयुष सहित चिकित्सा महाविद्यालयों में बनी हुई है। इतना ही नहीं संसाधनों के अभाव में ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को भी पुख्ता स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। प्रदेश में डॉक्टर्स की कमी का आदम यह है कि जिला अस्पतालों में ही नहीं गांवों में भी अस्पताल खाली पड़े हैं। हालांकि गांवों में डॉक्टर्स की कमी को पूरा करने के लिए विभिन्न राज्य सरकार ने कुछ साल पहले सख्त कानून बनाया है। मेडिकल छात्रों से ये बॉन्ड भरवाना शुरु किया गया कि वे पढ़ाई के बाद अनिवार्य रूप से कुछ साल ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं देंगे। बावजूद इसके बाद भी प्रदेश की जनता को लाभ नहीं मिल पाया है। जनगणना 2011 के अनुसार आज भी देश में 69 फीसदी आबादी गांवों में ही रहती है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार देश के 20 फीसदी डॉक्टर ही ग्रामीण क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर यह अस्पताल चिकित्सकों के अलावा सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। नीति आयेाग द्वारा साल के शुरुआत में जारी की गई एक रिपोट्र के अनुसार प्रदेश के 51 जिला अस्पतालों में आठ के अलावा शेष जनता के लिये तय स्वास्थ्य मानकों को जहां पूरा नहीं कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर इनमें चिकित्सकों, नर्सों और पैरामेडिकल कर्मचारियों की भारी कमी बनी हुई है। रिपोर्ट बताती है कि भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानक के विपरीत प्रदेश के 15.69 प्रतिशत जिला अस्पतालों में ही डॉक्टर तैनात हैं। वहीं इसमें तैनात स्टाफ नर्सों का प्रतिशत 25.49 में सिमट गया है। इतना ही नहीं पैरामेडिकल स्टॉफ का प्रतिशत भी  68.63 से अधिक नहीं है। भारतीय सार्वज्निक स्वास्थ्य मानक के अनुसार 100 बिस्तर तक के अस्पताल के लिये कुल 105 कर्मचारियों की आवश्यकता अनिवार्य है। इनमें डॉक्टर 29, स्टॉफ नर्स 45 और पैरामेडिकल कर्मचारियों की संख्या 31 आवश्यक है। वहीं 500 बिस्तरों के मामले में 68 डॉक्टर, 225 स्टाफ नर्स, 100 पैरामेडिकल सहित कुल 393 अधिकारियों कर्मचारियों की संख्या तय की गई है। प्रदेश की यह स्थित तब सामने आई हे जबकि जनता के मूलभूत अधिकारों में स्वास्थ्य का विषय शामिल है और यह राज्य सरकार के िजम्मे है। बावजूद इसके प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाल बनी हुई है। जबकि इसके लिये सरकार लगभग पांच हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करती है। प्रदेश के स्वास्थ्य अमले में बढ़ोतरी आवश्यक मानी जा रही है। क्योंकि प्रदेश में जहां चिकित्सकों के चारह जार से अधिक पद खाली हैं। इसके अलावा 12 मेडिकल कॉलेजों में 1000 से अधिक पद रिक्त हैं। वहीं दूसरी ओर 17 हजार से अधिक प नर्सिंग स्टाफ, लैब तकनीशियन और रेडियोग्राफरों के साथ कम्पाउंडरों के खाली पड़े हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधओं के मद्देनजर प्रशासनिक उदासीनता जनता पर भारी पड़ रही है। आंकलन इसी से किया जा सकता है कि मप्र में ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधआों का विस्तार करने पिछले पांच साल में करीब छह हजार उप स्वास्थ्य केंद्र भवनों का निर्माण किया जाना था, लेकिन केंद्र सरकार से फंड मिलने में देरी की वजह से 2300 उप स्वास्थ्य केंद्र ही निर्मित हो सके हैं।

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