गांव में होली पर पहले जैसा उल्लास देखने को नहीं मिलता
लखनऊ
,होली को भाईचारे प्रेम व समाज में सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक माना जाता है। सभी जाति के लोग आपस में एक दूसरे के गले मिलते थे। किंतु अब होली हुड़दंग कटुता व जातीय विद्वेष के चलते अपने मूल उद्देश्य से भटकती जा रही है। अब देहात क्षेत्र के ग्रामीण सिर्फ त्यौहार की अपरिवारिक्ता का निर्वाहन करते हैं। गांव में होली पर अब पहले जैसा उल्लास देखने को नहीं मिलता। बगहा इटौंजा के राकेश कुमार कठेरिया का कहना है कि राजनीतिक दलों ने ग्रामीणों का समाज में जातीयता का विष घोल दिया है। पहले लोग जात पात को भूलकर एक दूसरे के गले मिलते थे। होली के त्यौहार पर लोग एक दूसरे को गुलाल व अंबीर लगाते थे और रंगों की बौछार करते थे। रात से ही होली के गीत गाए जाते थे। अब गांवों से होली का स्वरूप बदलता जा रहा है। अब ग्रामीण उन्हीं लोगों से होली मिलते हैं जिनसे उनका स्वार्थ सिद्ध होता है अन्य लोगों से वह मिलना नहीं चाहते हैं। स्वार्थ की भावना ने भी लोगों को अलग करने का काम किया है।
राजापुर के दलित सियारम कनौजिया का कहना है कि पहले सभी जातियों में प्रेम भाव था। अगड़ी जातियों के लोग अनुसूचित जाति व पिछड़ी जाति से कटुता नहीं रखते थे। बल्कि होली के त्योहार के समय गांव का मुखिया या धनी व्यक्ति गरीबों को गेहूं पैसे देकर उनकी मदद करता था। पर आज सभी जाति के लोग शराब के नशे में धुत होकर अपने भाई को गाली देते हैं और तथा मारपीट करते हैं और होली के त्यौहार पर हुड़दंग मचाते हैं । प्रेम भावना समाप्त होती नजर आ रही है। समाज में दिनोंदिन वैमनस्यता फैलती जा रही है। ग्राम सिंघामऊ के रामनरेश सिंह भदोरिया तथा इंदारा गांव के अमित गुप्ता का कहना है कि होली के त्यौहार पर मुसलमान भी होली मिलने जाते थे किंतु कुछ फिरकापरस्ती व प्रतिक्रियावादी ताकतों ने हिंदू और मुसलमानों में द्वेष की भावना पैदा कर दी है। होली के त्यौहार पर हिंदू मुसलमानों को यह संकल्प करना चाहिए कि हम एक राष्ट्र के निवासी हैं और भारत का प्रत्येक नागरिक हमारा भाई है। अब ग्रामीण न तो होलिका दहन और न चाचर में ही शामिल होते हैं। वह सिर्फ होली के त्यौहार की रस्म अदायगी ही करते हैं।
