Friday, October 16, 2026
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आधुनिक शिक्षा पद्धति और पारंपरिक शिक्षा पद्धति के सम्मिश्रण पर चर्चा

देहरादून। पारंपरिक भारतीय शिक्षा प्रणाली के महत्व पर प्रकाश डालने और भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित रिसर्च को बढ़ावा देने के उद्देश्य से देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी में सम्मलेन का आयोजन किया गया। इसमें विशेषज्ञों ने अपने विचार व्यक्त किए। मांडूवाला स्थित यूनिवर्सिटी परिसर में आयोजित सम्मलेन में आधुनिक शिक्षा पद्धति में प्राचीन शिक्षा पद्धति के सम्मिश्रण पर चर्चा की गई। इसे आने वाली पीढ़ी के लिए उपयोगी बताया गया। मुख्य अतिथि भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय सह-संगठन मंत्री शंकरानंद वीआर ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय शिक्षण प्रणाली में मील का पत्थर साबित होगी। नई शिक्षा नीति के माध्यम से देश की आने वाली पीढ़ी हमारे देश के वास्तविक इतिहास और महान संस्कृति से परिचित हो सकेगी। पूर्व डीजीपी अनिल रतूड़ी ने कहा कि सभ्यता चाहे जितनी बड़ी हो, बिना संस्कृति की रक्षा के वो मिट जाती है। इसलिए हमें अपनी पुरातन संस्कृति को भारतीय ज्ञान परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ाना होगा। छात्रों को अपनी परंपराओं से अवगत कराना होगा। हेस्को के संस्थापक पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि दुनिया पर हमारी पकड़ तभी बनेगी, जब हमारी शिक्षा प्रणाली मजबूत होगी। प्राचीन और आधुनिक शिक्षा प्रणाली के सम्मिश्रण से बनी नई शिक्षा नीति का अनुसरण बहुत अच्छा प्रयास है। विवि की कुलपति प्रो. प्रीति कोठियाल ने कहा कि सम्मेलन का उद्देश्य प्रतिभागियों को भारतीय ज्ञान प्रणाली को संरक्षित और प्रसारित करने में सक्षम बनाना है। कार्यक्रम में विवि के उपकुलाधिपति अमन बंसल, उपकुलपति प्रो. आरके त्रिपाठी, चीफ ऑडिटर डॉ. संदीप विजय, मुख्य सलाहकार डॉ. एके जायसवाल, डीन एकेडेमिक्स डॉ. एकता उपाध्याय आदि मौजूद रहे।
भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार हो अनुसंधान : डॉ. पांडे
भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ स्कूल एजुकेशन एंड लिटरेसी (डीएसईएल) के निदेशक डॉ. जेपी पांडे ने कहा कि नई शिक्षा नीति का उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को देश के वास्तविक इतिहास और महान संस्कृति से रूबरू करवाना है। उन्होंने विवि का प्रयास की सराहना की। वह वेबिनार के माध्यम से सम्मेलन से जुड़े।

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