Friday, October 16, 2026
UTTAR PRADESH

कामकाज ठप्पे, मजदूर व मध्यमवर्गीय परिवार भीषण संकट में

कोरोना काल में लोगो को पड़ रहे खाने के लाले

सहारनपुर

साल 2020 में कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर किये गये लॉकडाउन के दौरान कामकाज ठप्प होने के कारण मजदूर पेशा गरीब एवं मध्यम वर्गीय परिवारों के सामने जो खाने का संकट पैदा हुआ था, उसमें सामाजिक संगठनों के साथ-साथ संवेदनशील सम्पन्न परिवारों के लोगों ने सामुदायिक रसोईयां चला कर जरूरतमंदों को भोजन के पैकेट वितरित करने का काम किया था, लेकिन कोविड-19 के 2021 या यूं कहे कि मौजूदा समय में संक्रमण से मरने वाले की बढ़ती संख्या के सापेक्ष शवों का संस्कार करने के लिए जगह के साथ-साथ चिता के लिए लकडिय़ां भी कम पड़ रही है। हकीकत नगर, शारदानगर, नुमायश कैम्प एवं बाडा बाबा लाल दास स्थित शमशान घाटों में प्रतिदिन दो से लेकर 6-7 शवों का संस्कार किया जा रहा है। गांव-देहात में भी वर्तमान समय में कोरोना संक्रमण समेत अन्य बिमारियों से ग्रस्त लोगों की मृत्यु दर बढी है। गांव-देहात में मरने वाले व्यक्ति के शव का अंतिम संस्कार करने के लिए ग्रामीण गांव से उपले तथा लकडी जुटा लेते हैं, लेकिन मौजूदा समय में महानगर में शवों का संस्कार करने में लकडी की कमी आडे आ रही है। इसी के चलते लकडी के दाम भी 300 एवं 350 रूपये प्रति कुन्तल से बढाकर कोरोना सक्रमण की दूसरी लहर में 500 से 600 रूपये प्रति कुंतल पर पहुंच गये हैं। किसी भी सामान्य वजन के शव का संस्कार करने के लिए तीन से 3.5 कुन्तल सुखी लकडी की आवश्यकता होती है तथा भारी शव के अंतिम संस्कार के लिए चार से पांच कुुन्तल लकडी लगती है। हिन्दू शमशान घाटों के साथ-साथ कब्रिस्तानों में शवों को सुपुर्दे-ए-खाक करने के लिए भी वर्तमान समय में एक दिन में कई-कई कब्र तैयार करने में परेशानी पेश आ रही है। कब्रिस्तानों में दफनाएं जाने वाली लाशों की कब्रों को बन्द करने के लिए जो लकडी के फटटे लगते हैं, उनकी कीमतें भी पहले से काफी बढ़ चुकी है। कोरोना संक्रमण से मरने वाले लोगों के शवों से उनके सगे सम्बन्धी भी किनारा कर रहे हैं, ऐसे में कुछ शवों के संस्कार करने में भी दिक्कतें हो रही है। मोजूदा हालात में संवेदनशील व मानवता वादी लोगों को ऐसे शवों का संस्कार कराने के लिए आगे आना जरूरी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *